16 नवंबर 2013 - 20:30
जैसे सहाबी मुझे मिले.........

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: जैसे सहाबी और साथी मुझे मिले वैसे सहाबी किसी औऱ को नहीं मिले। इमाम हुसैन ने यह वाक्य केवल इसलिए नहीं कहा कि आपके साथियों ने पूरे लगाव से आपकी मदद करते हुए आप पर अपनी जान न्यौछावर कर दी

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: जैसे सहाबी और साथी मुझे मिले वैसे सहाबी किसी औऱ को नहीं मिले। इमाम हुसैन ने यह वाक्य केवल इसलिए नहीं कहा कि आपके साथियों ने पूरे लगाव से आपकी मदद करते हुए आप पर अपनी जान न्यौछावर कर दी बल्कि इमाम हुसैन अ.स के सहाबी इस्लामी शिक्षाओं पर अमल और इमाम की सही पहचान के सिलसिले में सब पर भारी थी यहाँ सिर्फ़ एक उदाहरण पेश किया जा रहा है।एक जंग के दौरान अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अ. नमाज़ के लिए मुसल्ला बिछा देते हैं तो इब्ने अब्बास सवाल करते हैं कि मौला क्या यह समय नमाज़ के लिए उचित है? इमाम (अ) ने फ़रमाया कि हम इसी नमाज़ के लिये तो जंग कर रहे हैं। लेकिन करबला के मैदान में नमाज़ के समय इमाम से कहा कि नमाज़ का समय हो गया है हम अपनी आख़री नमाज़ आपके पीछे पढ़ना चाहते हैं। इमाम हुसैन (अ) ने जानबूझ के नमाज़ के लिये ख़ुद नही कहा ताकि मालूम हो जाये कि मेरे सहाबी किसी दुनियावी लालच में उनके साथ करबला में नहीं आये हैं बल्कि इस्लाम की सुरक्षा के लिए उनके साथ आये हैं।